सन्देश
 

सत्यसमाज के उद्देश को कुछ विस्तार से समझने के लिए सत्येश्वर के चौबीस सन्देश हैं जिन्हें जीवनसूत्र भी कहते हैं |

1. विवेकी बनो

अच्छे बुरे का, अर्थात सामूहिक हित अहित के ठीक ठीक निश्चय का नाम विवेक है |  इसकेलिए रूढ़ियों का अन्धविश्वास, देव मूढ़ता (देवताओं का उपयोग पाप की माफी मांग मांगकर पाप करने की छुट्टी पाने में करना, बुरे कामों में उनसे आशीर्वाद मांगना आदि) गुरुमूढ़ता (असाधुओं को अन्धविश्वास के कारण साधु मानना, वेष आदि को अधिक महत्व देना, उनकी समाजोपयोगिता का विचार न करना आदि), शास्त्रमूढ़ता (युगसत्य की उपेक्षा कर परम्परा के कारण, अमुक भाषा में बना होने के कारण या प्राचीन होने के कारण किसी शास्त्र को अधिक महत्व देना आदि) का त्याग करना चाहिए | यथाशक्य निष्पक्षता और बुद्धि से काम लेना चाहिए |

2. धर्म समभावी बनो

धर्मों को उनके स्थापित होने के युग की उपयोगिता का ध्यानकर यथायोग्य आदर दो | अपनेपन के कारण किसी धर्म को सर्वश्रेष्ट मत समझो | साधारणत: संसार के मुख्य मुख्य धर्म-प्रवर्तकों के विषय में तथा उनके धर्मस्थानों के विषय में आदर दिखाओ | धर्म के कारण जीवन के सहयोग में बाधा न आने दो |

3. जाति समभावी बनो

रंग राष्ट्र जीविका वंशपरम्परा आदि को जाति भेद का कारण न समझो | विवाह में खानपान में और दूसरी हर बात का विचार करो लेकिन जाति-पांति का विचार न करो | विवाह में सदा सोलह बातों का विचार करो |

सदाचार सत्संग वय भोजन एक विचार |
सह्जीविका स्वस्थ धन शिक्षण शिष्टाचार ||967
सहभाषा सौन्दर्य गृह पथ कर्मठता चाह |
जहाँ रहें अनुकूल ये करना वहीँ विवाह ||968
सत्येश्वर गीता

4. नर-नारी समभावी बनो

नारीत्व  के कारण उसका दर्जा छोटा न समझो | उसकी योग्यता सेवा पद आदि के कारण उसे समभाव से सन्मान और महत्व दो | नारीत्व को हीन न गिनो |

5. अहिंसक बनो

स्वार्थवश अहंकार वश किसी के तन को या मन को चोट न पहुँचाओ | अनुशासन में भी यथायोग्य नर्मी से काम लो | विश्वास रक्खो कि एक दिन मानव समाजकी सब व्यवस्थायें और व्यवहार अहिंसा या प्रेम के आधार पर ही चलाना है | 

6. सत्य बोलो

जीवन में विश्वसनीय बनो | स्वार्थ, भय और संकोच में भी पड़कर किसी को धोखा न दो |

7. ईमानदार रहो

चोरी ठगी आदि से बचो | उधार लेकर जरूर चुकाओ | व्यापार में, लेनदेन में धोखा न दो |

8. शीलपालन करो

व्यभिचार से दूर रहो | जब तक किसी स्त्री के साथ शादी नहीं हुई, या शादी का संकल्प नहीं, अथवा और किसी वैधानिक या न्यायोचित तरीके से काम-मिलन की अनुज्ञा प्राप्त नहीं हुई तब तक उसके साथ माँ बहिन बेटी के समान शिष्टाचार निभाओ | इसी तरह पुरूष के साथ पिता भाई पुत्र के समान शिष्टाचार  निभाओ | मन वचन को भी इसी शिष्टाचार के अनुकूल रक्खो |

9. दुर्व्यसन छोड़ो  

शराब बीड़ी सिगरेट आदि जो पदार्थ शरीर के पोषक नहीं है, और दूसरों की परेशानी बढा़ते हैं, खाद्य सामग्री का नाश करते हैं, न मिलने पर बेचैनी पैदा करते हैं उनकी आदत छोड़ो |

10. श्रम की प्रतिष्ठा करो

जब तक वृद्धता न आजाये तब तक उचित मात्रा में समाज हित का कार्य करते रहो |  श्रम करने को लघुता और श्रम न करने को महत्ता न समझो |

11. अति संग्रह मत करो 

जिन चीजों का जितना संग्रह समाज हित के प्रतिकूल न हो, अपने लिए अनावश्यक न हो उससे अधिक संग्रह न करो |

12. अतिभोग मत करो

जिससे स्वस्थ बिगड़ जाय, अपनी आर्थिक स्थिति बिगड़ जाय, या दूसरों को अनुचित रूपमें कमी पड़जाय उतनी अधिक मात्रा में किसी चीज का उपयोग न करो |

13. बलवान बनो

मन को निर्भय बनाओ (अविनय या अशिष्टता का नाम निर्भयता नहीं है) जिससे विपत्ति में धैर्य रहे, संकटों में दृढ़ता रहे, सत्संकल्प पूरा करने का निश्चय रहे, भय के कारण कर्तब्य भ्रष्टता न आये | तन को भी बलवान बनाओ जिससे उसमें सहन शीलता रहे, कर्मशीलता रहे |

14. स्वतंत्र और गौरवशाली बनो 

स्वतंत्रता का अर्थ अविनय या उच्छंखलता नहीं हैं, और न पारस्परिक सहयोग के उचित बन्धनों या मर्यादाओं का तोड़ना स्वतंत्रता है, किन्तु राजनैतिक गुलामी या दास प्रथा आदि का हटाना स्वतंत्रता है | इस या अन्य प्रकार से मनुष्य में नागरिकता का गौरव पैदा होना चाहिए | गौरवशाली मनुष्य क्षुद्रताओं का प्रदर्शन नहीं करता, भिखारियों सरीखी दीनता नहीं दिखाता, ऐसे कोई बुरे काम नहीं करता जिसमें गौरव हानि होती हो |

15. शिष्ट बनो 

कषाय वृत्तियों का दुरूपयोग न करो, उनको वश में रक्खो | उनको ऐसा उग्र न बनने दो की सभ्यता शिष्टाचार न्याय आदि में बाधा पड़े |

16. पुरुषार्थी बनो
अपनी गलतियों को भाग्य के नाम पर न छिपाओ, भाग्य अपना काम कर चुका, वह भूत की चीज है वर्तमान और भविष्य तुम्हारे हाथ है |

17. संसार को उन्नतिशील बनाओ 

भूतकाल के कल्पित स्वप्न देखना, वर्तमान से घृणा करना, भविष्य के विषय में निराश रहना आदि छोड़ देना चाहिए | यह अवसर्प्रिणी है कलियुग है आदि मान्यताएँ मनुष्य को हतोत्साह करनेवाली हैं | यह बीमारी संसार को दु:खमय मानने से भी होती हैं इसलिए इस मान्यता का भी त्याग करना चाहिए |

18. संयमियों के हाथ में शासन सौपों 

सुशासकता प्रणाली या किसी योजना से ही समाज की राज्य समस्यायें हल नहीं  होतीं, उसके लिए सेवाभावी, सदाचारी, समभावी तथा कर्तव्य की योग्यता रखने वाले जिम्मेदार व्यक्तियों के हाथ में शासन कार्य सौपना चाहिए |

19. युद्धों का अन्त हो  

पशुबल या युद्ध से शक्ति का पता लगता है, दोष या निर्दोषता का नहीं | इसलिए हर एक झगड़े का निवटारा समझौते से, या न्यायालय से कराना चाहिए | युद्धों को गैरकानूनी ठहराना चाहिए | युद्ध पशुता की निशानी है |

20. समाज के सुख साधनों की वृद्धि करो    

नीति की मर्यादा का भंग न हों, फिर जितनी अधिक सम्पत्ति बढ़ाई जासकती हों, उत्पादन बढ़ाया जासकता हो, सुख साधन बढ़ाये जासकते हों, बढ़ाना चाहिए |  यद्धपि सुख बाहर की वस्तु नहीं है फिर भी समाज की कंगाली या गरीबी भी सुख नहीं है | गरीबी का, त्याग और संतोष से भी सम्बन्ध नहीं है |

21. मानव की एक भाषा हो

यातायात के प्रबल साधनों से पृथ्वी के सभी देशों के मनुष्यों का गाढ़ सम्बन्ध स्थापित हो गया है | ऐसी हालत में सब में एक सामाजिकता, एक जातीयता, एक राष्ट्रीयता पैदा करने के लिए मनुष्य मात्र की एक भाषा बनाओ | अपनी अपनी मातृभाषा भले ही रहे, पर एक मानव भाषा सब सीखें | वह मानवभाषा सरल नियमितता में सर्वश्रेष्ट  होना चाहिए | ऐसी भाषा नवनिर्मित ही होसकती है | क्योंकि आज की सभी भाषाएँ अनियमित और कठिन हैं |
(इस प्रकार की मानवभाषा सत्यसमाज ने उपस्थित करदी है | जिसका व्याकरण एक दो दिन में सीखा जासकता है, धातुकोष शब्दकोष आदि काफी सरल है |)

22. सब देशों का एक मानव राष्ट्र हो 

आज की आवश्यकताओं को देखते हुए सभी राष्ट्र अधूरे हैं, इसलिए भी सब को मिलकर एक बन जाना चाहिए | प्रारम्भ में कम से कम इतना तो करना ही चाहिए की रक्षा, अन्तराष्ट्रीय यातायात, अन्तराष्ट्रीय न्यायालय, करेंसी, आदि खास खास विषयों का अधिकार रखने वाली, और सब राष्ट्रों के उचित प्रतिनिधित्व वाली एक पृथ्वी सरकार बनाली जाय | और धीरे धीरे उसके आवश्यक अधिकार बढ़ाकर आजके सब राष्ट्रों को प्रान्त की श्रेणी में लादिया जाय |

23. विश्व कुटुम्बी बनो   

हर एक के संकट में काम आओ, सब देशों की सामूहिक उन्नति का ध्यान रक्खो, किसी देश के किसी संकट से अनुचित लाभ न उठाओ |

24. कर्मयोगी बनो

कर्तव्य को कर्तव्य समझकर करते रहो | फल अफल की, जल्दी देर की, पर्वाह मत करो | नाटक के खिलाड़ी की तरह जीवन का खेल खेलो | इससे जीवन हर हालत में सुखी शान्त और कर्तव्यतत्पर रहेगा |